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पश्चिम बंगाल चुनाव; क्या मुस्लिम नाम ही कारण है? पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश का नाम मतदाता सूची से हटाने का विवाद

पूर्व कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सैयदुल्ला मुंशी का नाम पश्चिम बंगाल के मतदाता सूची से हटाना चुनावी पारदर्शिता और कथित भेदभाव पर गंभीर चिंताएँ उठाता है।

Elections

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रणाली पर गंभीर संदेह उठाने वाली घटना सामने आई है। Syedullah Munshi नाम के पूर्व न्यायाधीश का नाम मतदाताओं की सूची से हटाए जाने को विवादास्पद माना जा रहा है। यह सामान्य प्रशासनिक लापरवाही है, या भेदभाव का संकेत है, इस पर प्रश्न उठ रहे हैं।

🔴 क्या हुआ?

विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद जारी की गई मसौदा मतदाता सूची में मुंशी, उनकी पत्नी और दो पुत्रों के नाम न होने से यह मामला सामने आया। तुरंत उन्होंने संबंधित अधिकारियों से शिकायत की।

आवश्यक सभी प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बावजूद: बूथ स्तर के अधिकारी के पास रसीद नहीं दी गई

चुनाव आयोग के कार्यालय में भी दस्तावेजों की स्वीकृति का कोई आधार नहीं है, अंतिम सूची में उनका नाम पूरी तरह से हटा दिया गया है।

परिवार के सदस्यों के नाम "जांच में हैं" के रूप में दिखाए गए हैं।

⚠️ पूर्व न्यायाधीश की प्रतिक्रिया

Bar and Bench को दिए गए इंटरव्यू में मुंशी ने गंभीर असंतोष व्यक्त किया। “मैंने कहीं भी अपनी स्थिति का उल्लेख नहीं किया। सामान्य मतदाता के रूप में व्यवहार किया। लेकिन अब मुझे अपने मतदान अधिकार को पुनः प्राप्त करने के लिए क्या करना है, यह नहीं पता,” उन्होंने कहा। इसके अलावा, राज्य में स्थापित अपीलेट ट्रिब्यूनल केवल कागजों पर ही हैं, इस पर उन्होंने आलोचना की।

🧨 भेदभाव के आरोप

इस घटना पर राजनीतिक और सामाजिक वर्गों में आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है। “क्या मुस्लिम नाम होना ही कारण है?” इस तरह के संदेह उठ रहे हैं। स्पष्ट कारण के बिना एक पूर्व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का नाम हटाना लोकतांत्रिक प्रणाली पर प्रश्न उठा रहा है।

🗳️ लोकतंत्र को खतरा?

चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव, उचित रिकॉर्ड प्रबंधन का न होना, नागरिकों के प्राथमिक अधिकारों में से मतदान अधिकार खोने की स्थिति उत्पन्न होना, विशेषज्ञों द्वारा लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत के रूप में चेतावनी दी जा रही है।

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